Democracy

प्रजातंत्र


सो रहा कोई
बनाकर तकीया पैसो का
मर रहा है कोई
दाना-पानी बीना
हो रहा है ऐसा
एक ही शहर में,

कोई नहाने में
लगा रहा है दस हजार
किसी को खाने में दस रूपया भी नहीं
क्या यही है जनतंत्रा
क्या यही है जनता की चाह
जो कर रहा ज्यादा काम मेहनत
है वही गिरा सबसे
जो बैठ कर तोड रहे है कुर्सी
वे खाते है छान कर चावल
जिससे हो रहा मन्द बुद्धि जिवियों का उपहास
बुद्धिजीवी कर रहे हे राज,


मुर्ख बना रहे है
बेवकुपफ बना रहे है
भोली-भाली जनता को,
क्या यही होता है
जनता के राज में
क्या यही है प्रजातंत्रा
अच्छा था इससे
कही, वही राज राजाओं का
इतने कष्ट न थी,
जनता को

मैं तो कहता हुँ,
होगा तोडना
इस प्रजातंत्रा को
और निश्चय टुडेगा ही
होगी तानाशाही का राज
तब होगा देश का विकास
फिर से लेगा जन्म सिकन्दर
देख लेना तुम आखे पफाड़कर
क्या यही है जनतंत्र

जिसमें पुरी नहींं होती हो
केवल अवश्यकताए
जनता की
दिख रहा है केवल अंधकार
भविष्य में इसके,
धुंधला  अस्पष्ट है
दे रहा है दिखाई
हास हो रहा है
नेताओ का चरित्रा,
मुल्य, भष्टाचार, घुसखोरी,
तस्करी और बढ़ रही है
बालात्कारी,
स्वार्थ की जल रही है भट्टी
नेताओं में
धु -धु कर  जल रहा है
गौरव प्रजातंत्रा का
भविष्य नहीं है
उत्साहजनक
हो गया है सब कुछ
अस्त व्यस्त
क्या यही है प्रजातंत्र

लाठीतंत्र और पैसातंत्र
निकल रहा है इससे आगे
हो गया है बोना प्रजातंत्रा
देखकर इन सबको,
नहीं लगता है मुझको

की यही है प्रजातंत्र।

-कस्तूरी

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