Hironchi
हिरोन्ची लगता है वह मानव नहीं, दान पेटी है दयावानो का, न कभी रोता है, न हँसता है, चलता है मूर्दा सा, है दिखता सन गये है बाल मिट्टी में, और कुचले जा रहे पैरे से हो रही है भयानक ध्वनी फिर भी सोया है निश्चित से चर्म, वस्त बना है एक सा, गाल पड़ी है कंकड पर, मखिया बना नहीं है भोजन, घुटनो और केहुनीयों पर, 12 बज चुके है, अब भी सोया है सड़क पर, लगता है कोई कचड़ा है, न देखो अगर पेट पर धूल पड़ रहे है, अर्ध् ढ़के बदन पर, आ रही है रोशनी सूर्य की सीधे पड़ रही है गाल पर फिर भी सोया है सड़क पर फिर भी पड़ा है निश्चिंत से। -कस्तूरी