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Hironchi

हिरोन्ची लगता है वह मानव नहीं, दान पेटी है दयावानो का, न कभी रोता है, न हँसता है, चलता है मूर्दा सा, है दिखता सन गये है बाल मिट्टी में, और कुचले जा रहे पैरे से हो रही है भयानक ध्वनी फिर  भी सोया है निश्चित से चर्म, वस्त बना है एक सा, गाल पड़ी है कंकड पर, मखिया बना नहीं है भोजन, घुटनो और केहुनीयों  पर, 12 बज चुके है, अब भी सोया है सड़क पर, लगता है कोई कचड़ा है, न देखो अगर पेट पर धूल  पड़ रहे है, अर्ध् ढ़के बदन पर, आ रही है रोशनी सूर्य की सीधे पड़ रही है गाल पर फिर  भी सोया है सड़क पर फिर भी पड़ा है निश्चिंत से। -कस्तूरी

Democracy

प्रजातंत्र सो रहा कोई बनाकर तकीया पैसो का मर रहा है कोई दाना-पानी बीना हो रहा है ऐसा एक ही शहर में, कोई नहाने में लगा रहा है दस हजार किसी को खाने में दस रूपया भी नहीं क्या यही है जनतंत्रा क्या यही है जनता की चाह जो कर रहा ज्यादा काम मेहनत है वही गिरा सबसे जो बैठ कर तोड रहे है कुर्सी वे खाते है छान कर चावल जिससे हो रहा मन्द बुद्धि जिवियों का उपहास बुद्धिजीवी कर रहे हे राज, मुर्ख बना रहे है बेवकुपफ बना रहे है भोली-भाली जनता को, क्या यही होता है जनता के राज में क्या यही है प्रजातंत्रा अच्छा था इससे कही, वही राज राजाओं का इतने कष्ट न थी, जनता को मैं तो कहता हुँ, होगा तोडना इस प्रजातंत्रा को और निश्चय टुडेगा ही होगी तानाशाही का राज तब होगा देश का विकास फिर से लेगा जन्म सिकन्दर देख लेना तुम आखे पफाड़कर क्या यही है जनतंत्र जिसमें पुरी नहींं होती हो केवल अवश्यकताए जनता की दिख रहा है केवल अंधकार भविष्य में इसके, धुंधला  अस्पष्ट है दे रहा है दिखाई हास हो रहा है नेताओ का चरित्रा, मुल्य, भष्टाचार, घुसखोरी, तस्करी और बढ़ रही है बालात्कारी, ...